देशभर में शीत लहर का प्रकोप शुरू हो चुका है। गिरते तापमान के साथ ही किसानों की चिंताएं भी बढ़ गई हैं, खासकर आलू की खेती करने वाले किसानों के लिए। कड़ाके की ठंड में आलू की फसल पर पाला (Frost) पड़ने और झुलसा रोग लगने का खतरा सबसे ज्यादा होता है, जिससे पूरी फसल बर्बाद हो सकती है।

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (PUSA) के वैज्ञानिकों के अनुसार, सही समय पर किए गए बचाव के उपाय न केवल फसल की सुरक्षा करते हैं, बल्कि बंपर पैदावार भी सुनिश्चित करते हैं। आइए जानते हैं आलू को पाले से बचाने के कुछ खास तरीके।
आलू की खेती को बचाने के 5 अचूक उपाय
1. लकड़ी की राख का प्रयोग
अगर तापमान में भारी गिरावट आती है, तो घर के चूल्हे से निकलने वाली लकड़ी की राख एक वरदान साबित हो सकती है।
- कैसे इस्तेमाल करें: एक एकड़ खेत में लगभग 10-12 किलोग्राम राख का छिड़काव फसल पर करें।
- लाभ: राख फसल को प्राकृतिक गर्मी प्रदान करती है और पाले के असर को कम करती है।
2. सिंचाई का सही तरीका
नमी पाले के विरुद्ध एक सुरक्षा कवच का काम करती है। वैज्ञानिकों की सलाह है कि पाले की संभावना होने पर खेत में हल्की सिंचाई जरूर करें।
- विशेष टिप: सिंचाई हमेशा धूप निकलने पर ही करें। रात में या बहुत ठंडी शाम को पानी देने से बचें।
3. गंधक (Sulphur) का स्प्रे
आलू को पाले से बचाने के लिए रासायनिक सुरक्षा भी आवश्यक है।
- विधि: 1 लीटर तरल गंधक को 1000 लीटर पानी में घोलकर 1 हेक्टेयर खेत में स्प्रे करें।
- असर: यह स्प्रे फसल के चारों ओर एक सुरक्षा घेरा बना देता है, जिससे पाले का प्रभाव नगण्य हो जाता है।
4. सड़े हुए छाछ का इस्तेमाल
जैविक खेती करने वाले किसान सड़े हुए छाछ को कीटनाशक के रूप में उपयोग कर सकते हैं। यह न केवल पाले से बचाता है बल्कि कई रोगों से भी सुरक्षा प्रदान करता है।
5. टाट या नेट का उपयोग
छोटे स्तर पर खेती करने वाले किसान अपनी फसल को ढकने के लिए टाट या नेट का सहारा ले सकते हैं। आजकल आधुनिक खेती में एंटी-फ्रॉस्ट नेट का चलन भी बढ़ गया है।
आलू का ‘पिछेती झुलसा’ रोग: पहचान और प्रभावी जैविक उपचार
पिछेती झुलसा आलू की फसल का सबसे खतरनाक दुश्मन माना जाता है। अगर इसका सही समय पर इलाज न किया जाए, तो यह मात्र 2-3 दिनों में पूरी फसल को नष्ट कर सकता है।
रोग की पहचान कैसे करें?
- पत्तियों के किनारों पर जलभराव वाले गहरे भूरे या काले धब्बे दिखाई देते हैं।
- पत्तों के निचले हिस्से पर सफेद रंग की फफूंद (रुई जैसी) जमा होने लगती है।
- बादलों वाले मौसम और नमी में यह बीमारी बिजली की रफ्तार से फैलती है।
प्रभावी जैविक और घरेलू उपचार
- सड़े हुए छाछ और तांबे का मिश्रण:
- एक मिट्टी के बर्तन में 5 लीटर पुरानी खट्टी छाछ लें।
- उसमें तांबे का एक टुकड़ा (जैसे बिजली का तार या तांबे का बर्तन) डाल दें।
- इसे 15 दिनों तक सड़ने दें। इसके बाद 1 लीटर इस मिश्रण को 15-20 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। यह एक शक्तिशाली जैविक कवकनाशी (Fungicide) है।
- दूध और बेकिंग सोडा का घोल:
- 1 लीटर दूध और 20 ग्राम बेकिंग सोडा को 10 लीटर पानी में घोलें।
- इसका छिड़काव करने से पत्तियों की सतह पर फफूंद नहीं पनप पाती।
- नीम का तेल:
- 5 मिली नीम का तेल प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। यह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है।
- ट्राइकोडर्मा विरिडी (Trichoderma Viride):
- यह एक लाभदायक फफूंद है। 5-10 ग्राम ट्राइकोडर्मा को प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करने से झुलसा रोग के कीटाणु मर जाते हैं।
बचाव के कुछ अन्य टिप्स:
- दूरी बनाए रखें: पौधों के बीच हवा का संचार होने दें ताकि नमी ज्यादा न टिके।
- संक्रमित पौधों को हटा दें: यदि किसी पौधे में लक्षण दिखें, तो उसे जड़ समेत उखाड़कर खेत से दूर जमीन में दबा दें।
- नाइट्रोजन का कम प्रयोग: रोग दिखने पर यूरिया (Nitrogen) का प्रयोग तुरंत बंद कर दें, क्योंकि इससे रोग और तेजी से फैलता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
आलू की फसल संवेदनशील होती है, लेकिन थोड़ी सी सतर्कता और पारंपरिक व वैज्ञानिक तरीकों का मेल किसानों को भारी नुकसान से बचा सकता है। यदि आप इन सुझावों का पालन करते हैं, तो आपकी फसल सुरक्षित रहेगी और बाजार में आपको बेहतरीन मुनाफा मिलेगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1. आलू में पाला लगने के लक्षण क्या हैं?
उत्तर: पाला लगने पर पत्तियां काली पड़कर सिकुड़ने लगती हैं और पौधा मुरझा जाता है।
Q2. गंधक के स्प्रे का असर कितने दिनों तक रहता है?
उत्तर: एक बार स्प्रे करने के बाद इसका असर लगभग 10-15 दिनों तक रहता है।
Q3. क्या राख का छिड़काव आलू की गुणवत्ता खराब करता है?
उत्तर: नहीं, लकड़ी की राख पूरी तरह प्राकृतिक है और यह खाद का भी काम करती है।
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